भारतीय उपउपमहाद्वीप के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में भाषाई क्षेत्रवाद केवल प्रशासनिक सीमाओं का रेखांकन नहीं रहा है, बल्कि यह एक गहरी, जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया रही है जिसमें भाषा, संस्कृति, राजनीति और सामाजिक न्याय के तार आपस में गुंथे हुए हैं। दक्षिण भारत में तमिलनाडु का गठन भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की एक वैश्विक मिसाल पेश करता है, जो महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक-राजनीतिक विद्रोह का प्रतिफल था । तमिल भाषा ने न केवल एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र की चेतना को आकार दिया, बल्कि उसे एक ऐसे राजनीतिक आधार में बदल दिया जिसने भारतीय संघवाद की प्रकृति को स्थायी रूप से प्रभावित किया है ।
क्षेत्र निर्माण में भाषा की भूमिका: तमिल भाषा के संदर्भ में
“तमिल ‘ताय’ से विधानसभा तक: भाषा, जाति और क्षेत्रवाद की यात्रा”
तमिल क्षेत्र के निर्माण की इस गाथा को समझने के लिए हमें इसे केवल भाषाई अस्मिता तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह घटना जाति संघर्ष, धार्मिक प्रतीकवाद और मुद्रण पूंजीवाद के हस्तक्षेप से उभरी एक ऐसी ऐतिहासिक परिघटना है जिसने एक ‘कल्पित समुदाय’ को भौतिक और राजनीतिक वास्तविकता में बदल दिया । इस लेख में हम उन विभिन्न वैचारिक और सामाजिक धाराओं का विश्लेषण करेंगे जिन्होंने तमिल क्षेत्र की चेतना को परिभाषित किया और उसे सत्ता के केंद्र में स्थापित किया। तमिल क्षेत्र की कल्पना का आधार आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से कहीं अधिक पुराना है। प्राचीन तमिल साहित्य, विशेष रूप से संगम साहित्य में ‘तमिलकम’ (Tamilakam) शब्द का उल्लेख मिलता है, जो उत्तर में तिरुपति की पहाड़ियों से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक के क्षेत्र को परिभाषित करता था । इस प्राचीन काल में क्षेत्र की भौगोलिक कल्पना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पारिस्थितिक थी। नोबोरु कराशिमा और राजन गुरुक्कल जैसे इतिहासकारों ने तमिल क्षेत्र के प्रारंभिक सामाजिक-आर्थिक गठन का विस्तृत विश्लेषण किया है। कराशिमा के अनुसार, चोल और बाद के विजयनगर काल के शिलालेखों से पता चलता है कि तमिल क्षेत्र में राज्य निर्माण की प्रक्रिया कृषि विस्तार और भूमि अनुदानों से गहराई से जुड़ी थी । चोल काल के दौरान ‘ब्रह्मदेय’ (ब्राह्मणों को दिए गए गाँव) और ‘उर’ (गैर-ब्राह्मण गाँव) के बीच का विभाजन सामाजिक स्तरीकरण की प्रारंभिक आधारशिला बना । राजन गुरुक्कल का तर्क है कि प्रारंभिक तमिल समाज ‘तिनै’ (Tinai) या विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों (पहाड़ी, चरागाह, कृषि भूमि, तटीय और मरुस्थल) में विभाजित था, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति और उत्पादन के तरीके थे । इन प्रारंभिक संरचनाओं ने तमिल भाषा को शासन और सामाजिक गौरव की भाषा के रूप में स्थापित किया। हालाँकि, शेल्डन पोलॉक के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप में संस्कृत ने एक ‘कॉस्मोपोलिस’ का निर्माण किया था जहाँ राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक वैधता संस्कृत के माध्यम से व्यक्त की जाती थी । तमिल के संदर्भ में पोलॉक का सिद्धांत एक संघर्षपूर्ण रूप लेता है, जहाँ तमिल केवल एक क्षेत्रीय भाषा के रूप में विकसित नहीं हुई, बल्कि उसने संस्कृत के सार्वभौमिक दावों के विरुद्ध अपनी विशिष्टता और प्राचीनता को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया ।
तमिल क्षेत्रवाद का आधुनिक वैचारिक आधार 19वीं शताब्दी के अंत में औपनिवेशिक भाषाविज्ञान के हस्तक्षेप से तैयार हुआ। इसमें रॉबर्ट काल्डवेल की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। 1856 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘ए कम्पेरेटिव ग्रामर ऑफ द द्रविड़ियन और साउथ इंडियन फैमिली ऑफ लैंग्वेजेज’ ने भाषाई और नस्लीय विमर्श को पूरी तरह बदल दिया। काल्डवेल ने वैज्ञानिक आधार पर यह सिद्ध किया कि तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाएँ (तेलुगु, कन्नड़, मलयालम) संस्कृत से स्वतंत्र एक अलग भाषा परिवार का हिस्सा हैं । उन्होंने ‘द्रविड़’ शब्द को पुनर्जीवित किया और उसे एक विशिष्ट नस्लीय पहचान प्रदान की। काल्डवेल के शोध ने दो प्रमुख धारणाओं को जन्म दिया, पहला भाषाई शुद्धता, तमिल एक ऐसी भाषा है जो अपनी व्याकरणिक और शब्दावली संरचना के लिए संस्कृत पर निर्भर नहीं है । दूसरा ऐतिहासिक संघर्ष, द्रविड़ लोग भारत के मूल निवासी थे, जिन पर ‘आर्यन’ आक्रमणकारियों ने संस्कृत और वर्ण व्यवस्था के माध्यम से अपनी संस्कृति थोपी। इस भाषाई खोज ने तमिल बुद्धिजीवियों को एक ऐसा तर्क प्रदान किया जिससे वे उत्तर भारतीय सांस्कृतिक प्रभुत्व को चुनौती दे सकें। काल्डवेल के शोध का प्रभाव केवल भाषाविज्ञान तक सीमित नहीं था; इसने ‘थानी तमिल इयक्कम’ (शुद्ध तमिल आंदोलन) जैसे आंदोलनों के लिए मार्ग प्रशस्त किया, जिसका उद्देश्य तमिल भाषा से संस्कृत के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना था ।
तमिल क्षेत्रवाद की कल्पना को ऐतिहासिक वैधता प्रदान करने में संगम साहित्य की ‘पुनर्खोज’ का योगदान अतुलनीय है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, सी. डब्ल्यू. थमोधरम पिल्लै और यू.वी. स्वामीनाथ अय्यर जैसे विद्वानों ने उन प्राचीन ग्रंथों को संकलित और प्रकाशित किया जो सदियों से ताड़ के पत्तों पर धूल फांक रहे थे। इन ग्रंथों, विशेष रूप से ‘पत्तुपात्तु’ और ‘एट्टुथोकै’ ने एक ऐसी गौरवशाली सभ्यता की छवि प्रस्तुत की जो उत्तर भारत के प्रभाव से मुक्त, धर्मनिरपेक्ष और अपने आप में पूर्ण थी । स्वामीनाथ अय्यर के कार्यों ने यह दिखाया कि तमिल साहित्यिक परंपरा ईसा पूर्व की सदियों तक जाती है, जो इसे संस्कृत के समकक्ष या उससे भी प्राचीन बनाती है । इस साहित्यिक पुनर्जागरण ने ‘तमिलकम’ की सीमाओं को भाषाई और सांस्कृतिक रूप से शाश्वत घोषित करने में मदद की, जिससे आधुनिक राजनीतिक दावों को एक अटूट ऐतिहासिक प्रमाण मिल गया । जॉर्ज एल. हार्ट के अनुसार, तमिल एक महान शास्त्रीय साहित्य है जो अपनी मौलिकता और सूक्ष्मता में ग्रीक और लैटिन के बराबर खड़ा है । उन्होंने तर्क दिया कि तमिल साहित्य में निम्न वर्ग (subaltern) और सामाजिक विविधता का जैसा चित्रण मिलता है, वैसा संस्कृत में दुर्लभ है । इस धारणा ने तमिलों के भीतर एक सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना को जन्म दिया, जिसने क्षेत्रीय चेतना को और अधिक सशक्त बनाया। तमिल क्षेत्रवाद को अन्य भारतीय भाषाई आंदोलनों से जो बात मौलिक रूप से अलग करती है, वह है भाषा का ‘मानवीकरण’ और ‘पवित्रीकरण’। प्रोफेसर सुमति रामास्वामी ने अपनी शोध ‘पैशन्स ऑफ द टंग’ में इस भावनात्मक आयाम का सूक्ष्म विश्लेषण किया है । उनका तर्क है कि तमिल विद्वानों और कवियों ने जानबूझकर तमिल भाषा को केवल संचार के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘मानवीकृत देवी’ (तमिल ताय या तमिल माँ) के रूप में रूपांतरित कर दिया । ‘तमिल ताय’ की अवधारणा 19वीं सदी के अंत में पी. सुंदरम पिल्लै की कविता ‘तमिल ताय वाल्तु’ के माध्यम से उभरी । यह कविता आज भी तमिलनाडु का आधिकारिक राज्य गीत है। रामास्वामी के अनुसार, जैसे-जैसे आधुनिकता के आगमन के साथ पारंपरिक धार्मिक विश्वासों की पकड़ ढीली हुई, तमिलों को एक नए प्रतीक की आवश्यकता महसूस हुई जो सामूहिक निष्ठा और भावनात्मक एकता को प्रेरित कर सके। तमिल भाषा को ‘माँ’, ‘देवी’ या ‘कुमारी’ के रूप में चित्रित करना इसी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता की पूर्ति थी। इस वैचारिक परिवर्तन के दूरगामी प्रभाव हुए,जब भाषा को देवी का दर्जा दिया गया, तो वह भूमि जहाँ वह बोली जाती थी – तमिलनाडु – एक पवित्र क्षेत्र में बदल गई। क्षेत्रीय सीमाएँ अब प्रशासनिक रेखाएँ नहीं थीं, बल्कि ‘देवी के शरीर’ या उसके निवास की पवित्र सीमाएँ बन गईं । इस ‘भाषा भक्ति’ ने एक ऐसी भक्ति को जन्म दिया जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति में गहराई से जमी हुई थी। 1960 के दशक के हिंदी विरोधी आंदोलनों के दौरान तमिल भाषा के लिए आत्मदाह करने वाले कार्यकर्ता इसी ‘माँ’ की रक्षा के प्रति समर्पित थे तमिल ताय एक ऐसा प्रतीक बन गई जिसने जाति और धर्म की सीमाओं को लांघकर सभी तमिलों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। तमिल क्षेत्र के निर्माण की प्रक्रिया केवल भावनात्मक लगाव या साहित्य की खोज तक सीमित नहीं थी; यह जमीनी स्तर पर सामाजिक और राजनीतिक शक्ति की पुनर्संरचना की प्रक्रिया थी। सुमित सरकार और एम.एस.एस. पांडियन जैसे इतिहासकारों ने रेखांकित किया है कि कैसे भाषा को जाति संघर्ष के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया । 1916 में ‘गैर-ब्राह्मण घोषणापत्र’ के प्रकाशन के साथ ही तमिल राजनीति में एक निर्णायक मोड़ आया । गैर-ब्राह्मण समुदायों (विशेषकर वेल्लालार, मुदलियार और चेट्टियार) ने महसूस किया कि सरकारी नौकरियों और राजनीतिक संस्थानों पर ब्राह्मणों का अनुचित प्रभाव है । उन्होंने ब्राह्मणवाद को ‘आर्यन’ संस्कृति का प्रतिनिधि माना और तमिल भाषा को अपनी मुक्ति के मार्ग के रूप में चुना।ई.वी. रामास्वामी ‘पेरियार’ द्वारा स्थापित आत्म-सम्मान आंदोलन ने भाषाई पहचान को सामाजिक क्रांति से जोड़ दिया । पेरियार का तर्क था कि ब्राह्मणवादी शोषण की जड़ें संस्कृत, हिंदी थोपने और मनुवादी ग्रंथों में हैं । इसलिए, तमिल भाषा की शुद्धता पर जोर देना और संस्कृत का बहिष्कार करना जाति आधारित शोषण से मुक्ति का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया । ए.आर. वेंकटचलपथी के कार्य इस बात की जाँच करते हैं कि कैसे मुद्रण क्रांति ने तमिलनाडु में एक भाषाई ‘कल्पित समुदाय’ को जन्म दिया । बेनेडिक्ट एंडरसन के सिद्धांत को लागू करते हुए, वेंकटचलपथी ने दर्शाया कि समाचार पत्रों (जैसे कुड़ी अरासु और विदुथलाई) और सस्ते पैम्फलेटों ने पेरियार के विचारों को क्षेत्र के सबसे गरीब और दूरदराज के हिस्सों तक पहुँचाया । इस मुद्रण संस्कृति ने एक समानांतर राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा दिया, जिसने भाषाई क्षेत्र के निर्माण के लिए एक बौद्धिक वातावरण तैयार किया। इसने साबित किया कि भाषा केवल उच्च वर्ग की जागीर नहीं है, बल्कि यह आम लोगों की अभिव्यक्ति और सत्ता प्राप्ति का माध्यम है । भारतीय संघ के भीतर तमिलनाडु का औपचारिक गठन 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम का परिणाम था, जिसने भाषाई आधार पर सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया । हालाँकि, यह प्रक्रिया सहज नहीं थी। मद्रास प्रेसीडेंसी के भीतर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषियों के बीच भौगोलिक सीमाओं को लेकर कड़ा संघर्ष हुए, 1952 में पोट्टी श्रीरामुलु के बलिदान के बाद आंध्र प्रदेश के गठन की लहर ने मद्रास राज्य के भीतर भी भाषाई पृथकतावाद को हवा दी । 1956 में, त्रावणकोर-कोचीन राज्य के तमिल भाषी क्षेत्रों (जैसे कन्याकुमारी और शेनकोट्टाह) को मद्रास राज्य में शामिल करने का निर्णय भाषाई और भौगोलिक निकटता के आधार पर लिया गया । वहीं, मालाबार और दक्षिण कनारा जैसे क्षेत्रों को केरल और कर्नाटक को सौंप दिया गया। इस पुनर्गठन ने कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तनों को जन्म दिया, प्रत्येक भाषाई समूह को अपना एक ‘घर’ या राज्य मिल गया, जिससे राज्य भाषा के प्रति निष्ठा और मजबूत हुई । सीमाओं के रेखांकन ने राज्य के भीतर भाषाई अल्पसंख्यकों (जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में तेलुगु या कन्नड़ बोलने वाले) के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कीं, क्योंकि राज्य प्रशासन अब पूरी तरह तमिल केंद्रित हो गया था । जिन क्षेत्रों में सदियों से साझा और मिश्रित भाषाएँ बोली जाती थीं, वहाँ अब ‘कठोर’ प्रशासनिक सीमाएँ खींच दी गईं ।
तमिलनाडु में भाषा की राजनीति का सबसे उग्र रूप ‘हिंदी विरोधी आंदोलनों’ (1937 और 1965) में देखने को मिला । इन आंदोलनों ने न केवल तमिल अस्मिता को परिभाषित किया, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभुत्व को समाप्त कर क्षेत्रीय दलों के शासन का मार्ग प्रशस्त किया। 1930 के दशक में राजाजी सरकार द्वारा हिंदी को अनिवार्य बनाने के निर्णय का पेरियार और जस्टिस पार्टी ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे ‘आर्यन साम्राज्यवाद’ और तमिल संस्कृति के विनाश के प्रयास के रूप में देखा । 1960 के दशक में, जब हिंदी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव आया, तो तमिलनाडु में एक व्यापक जन-विद्रोह हुआ। अन्नादुराई के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने तर्क दिया कि एक बहुभाषी देश में किसी एक भाषा को थोपना अन्य भाषाई समूहों के साथ अन्याय है । उन्होंने ‘दो-भाषा नीति’ (तमिल और अंग्रेजी) की वकालत की, जहाँ अंग्रेजी को वैश्विक ज्ञान और वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ हिंदी के प्रभुत्व के विरुद्ध एक ‘ढाल’ के रूप में देखा गया । 1967 के चुनावों में DMK की ऐतिहासिक जीत ने भाषा को राज्य सत्ता का केंद्र बना दिया । इसके बाद, तमिल को प्रशासन और उच्च शिक्षा की मुख्य भाषा बनाया गया, जिससे गैर-ब्राह्मणों के लिए नौकरियों और सत्ता के द्वार खुले । मद्रास राज्य का नाम बदलकर ‘तमिलनाडु’ (तमिल देश) किया गया, जो भाषाई क्षेत्र के निर्माण की प्रक्रिया का चरम बिंदु था । तमिलनाडु ने भारतीय संघ के भीतर अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता को स्थायी रूप से स्थापित किया, जो अन्य क्षेत्रीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा बनी । 21वीं सदी में भी तमिल भाषा और क्षेत्र निर्माण का मुद्दा जीवंत बना हुआ है। 2004 में तमिल को भारत की पहली ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा मिलना इस लंबे संघर्ष की एक बड़ी प्रतीकात्मक जीत थी । जॉर्ज हार्ट जैसे विद्वानों के तर्क और एम. करुणानिधि की राजनीतिक इच्छाशक्ति ने यह सुनिश्चित किया कि तमिल की प्राचीनता को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया जाए ।आज भी, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और हिंदी के बढ़ते उपयोग को लेकर तमिलनाडु में गहरा असंतोष है । मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का यह रुख कि तमिल को अन्य भाषाओं के अधीन नहीं होने दिया जाएगा, वही पुरानी द्रविड़ विचारधारा की निरंतरता है । तमिल क्षेत्रवाद के मॉडल ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं, संघीय ढांचा,क्या भाषाई राज्यों ने भारत की एकता को मजबूत किया है या उसे खंडित किया है? तमिलनाडु का उदाहरण दिखाता है कि क्षेत्रीय पहचान का सम्मान करना ही वास्तविक संघीय मजबूती का आधार है,सामाजिक न्याय बनाम भाषाई गौरव क्या भाषाई गौरव ने वास्तव में सभी जातियों को समानता दी है? द्रविड़ राजनीति के आलोचक, जैसे सुमित सरकार, तर्क देते हैं कि भाषाई राष्ट्रवाद के आवरण में कभी-कभी निचले पायदान पर खड़े समुदायों (विशेषकर दलितों) की आर्थिक समस्याओं को अनदेखा किया गया है । वैश्वीकरण का प्रभाव,आज के डिजिटल युग में तमिल पहचान का स्वरूप बदल रहा है। ए.आर. वेंकटचलपथी के अनुसार, ‘इंटरनेट’ तमिल पहचान को वैश्विक तमिल प्रवासियों के साथ जोड़कर इसे एक नया ‘डिजिटल द्रविड़’ स्वरूप प्रदान कर रहा है । त
मिलनाडु में क्षेत्र के निर्माण में भाषा की भूमिका केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक जीवित प्रक्रिया है। यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि तमिल क्षेत्र का उदय केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का परिणाम नहीं था, बल्कि यह प्राचीन साहित्य की खोज, मिशनरी भाषाविज्ञान के प्रभाव, जाति संघर्ष की तीव्रता और भाषा के प्रति गहरी भावनात्मक भक्ति का एक जटिल संगम था । तमिल भाषा ने इस क्षेत्र के लोगों को एक साझा इतिहास, एक पवित्र भूगोल और एक शक्तिशाली राजनीतिक उपकरण प्रदान किया है। इसने ब्राह्मणवादी प्रभुत्व को चुनौती दी, उत्तर-दक्षिण शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित किया और भारतीय संघवाद के भीतर सांस्कृतिक बहुलता की रक्षा के लिए एक आदर्श स्थापित किया । यद्यपि क्षेत्र के भीतर जातिगत और वर्ग आधारित चुनौतियाँ बनी हुई हैं, फिर भी तमिल भाषा एक ऐसे सेतु के रूप में कार्य करती है जो राज्य के गौरव को उसके सामाजिक न्याय के लक्ष्यों के साथ जोड़ती है। क्षेत्र के निर्माण में तमिल भाषा की भूमिका को समझना आज के भारत में केंद्र-राज्य संबंधों, भाषाई विविधता और पहचान की राजनीति की जटिलताओं को समझने के लिए अनिवार्य है।
तमिलनाडु की विरासत यह याद दिलाती है कि एक राष्ट्र की एकता उसकी विविधता को दबाने में नहीं, बल्कि उसे उचित सम्मान और स्थान देने में निहित है । यह लेख तमिल क्षेत्रवाद को एक ऐसी शक्ति के रूप में चित्रित करती है जिसने भाषा को ‘देवी के शरीर’ से लेकर ‘संसद की गलियारों’ तक एक जीवंत और गतिशील इकाई बना दिया है । तमिल भाषा की भूमिका केवल एक इतिहास नहीं है; यह भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर स्वायत्तता और पहचान के संघर्ष की एक निरंतर चलने वाली गाथा है ।
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